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how emergence of Basant Panchami in Indian Hindu religion its infinite significance

भारतीय हिन्दू धर्म में बसंत पंचमी का कैसे हुआ उद्गमन और इसका अनंत महत्त्व

भारतीय हिन्दू धर्म में 'बसंत पंचमी' पर्व भारत वर्ष में ही नहीं अपितु पूरे विश्व भर में हर्ष और उल्लास के साथ बड़े धूम-धाम से मनाया जाता है। बसंत पंचमी के इस पर्व यानि त्यौहार को 'श्रीपंचमी' श्री यानि माँ सरस्वती  भी कहते हैं। यह त्यौहार पूर्वी भारत, पश्चिमोत्तर बांग्लादेश, नेपाल और कई राष्ट्रों में बड़े उल्लास से मनायी जाती है।

हिन्दू कैलेंडर के अनुसार यह त्यौहार माघ मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को हर साल मनाया जाता है। यह पर्व इस वर्ष 22 जनवरी 2018 को मनाया जाएगा।  बसंत पंचमी के इस शुभ पर्व पर ज्ञान, संगीत और कला से पूर्ण 'माँ देवी सरस्वती' की पूजा की जाती है। हिन्दू कथा के अनुसार सृष्टि के प्रारंभिक काल में भगवान विष्णु की आज्ञा से ब्रह्मा ने जीव-जन्तु, वनस्पतियों की रचना की खासतौर पर मनुष्य योनि की रचना की।  ब्रह्मा जी को अपने द्वारा की गयी सर्जना में कुछ कमी दिखने के अनुसार संतुष्ट नहीं थे। उन्हें लगता था कि कुछ कमी रह गई है जिसके कारण चारों ओर मौन छाया रहता है। भगवान विष्णु से अनुमति प्राप्त  कर ब्रह्मा ने जल से सुशोभित भरे हुये पूर्ण कमण्डल से जल छिड़का, पृथ्वी पर जलकण बिखरते ही पृथ्वी कंपन करने लगी जैसा लगा की कोई सोया हुआ व्यक्ति जाग गया हो। इसके बाद वृक्षों के बीच से एक अद्भुत शक्ति का जन्म हुआ। यह प्राकट्य एक चतुर्भुजी सुंदर स्त्री का था जिसके एक हाथ में वीणा तथा दूसरा हाथ वर मुद्रा में थी। अन्य दोनों हाथों में पुस्तक एवं माला थी। भगवान ब्रह्मा ने देवी से वीणा बजाने का अनुरोध किया। जैसे ही देवी ने वीणा का मधुरनाद किया ठीक उसी समय  संसार के समस्त जीव-जन्तुओं को वाणी प्राप्त हो गई। जलधारा में कोलाहल व्याप्त हो गया। पवन चलने से सरसराहट होने लगी। तब ब्रह्मा ने उस देवी को वाणी की देवी सरस्वती कहा। सरस्वती को बागीश्वरी, भगवती, शारदा, वीणावादनी और वाग्देवी सहित अनेक नामों से पुकारा जाने लगा और उनकी पूजा करी जाने लगी। माँ भगवती सरस्वती विद्या और बुद्धि प्रदाता हैं। संगीत की उत्पत्ति करने के कारण ये संगीत की देवी भी हैं। बसन्त पंचमी का दिन माँ सरस्वती के जन्मोत्सव के रूप में भी मनाया जाता है। इस पुण्य पर्व में शिक्षा के क्षेत्र में पदार्पण करने वाले बच्चों को हिंदू रीति के अनुसार उनको पहला अक्षर पढ़ना-लिखना सिखाया जाता है। और विद्यालयों में माँ सरस्वती जी का पूजन भी किया जाता है।

बसंत पंचमी सर्दियों के मौसम के अंत का प्रतीक है। बसंत ॠतु को ॠतुओं का राजा कहा जाता है। इसके आते ही मौसम खुशनुमा हो जाता है। ठंढ़ का असर खत्म होने लगता है। इस दिन पीला रंग आकर्षण का केंद्र होता है। लोग पीले रंग के वस्त्र पहनते हैं और पीली मिठाई बनाई जाती है। ये रंग माँ सरस्वती और सरसों की फसलों को समर्पित होती है। फल-फूल,फसलें खिल उठते हैं। पीले खिल-खिलाते हुए सरसों के खेत से बसंतोत्सव की शोभा बढ़ जाती है। प्रकृति और समस्त जीव-जंतु में नवजीवन का संचार होता है। इस मौके पर छोटे-बड़े सभी लोग पतंगे उड़ाकर भी उत्सव का आनंन्द लेते हैं। इस मौसम में हर मौसम का आंनद लिया जाता है। 

Date Published : 22 Jan 2018
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