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धार्मिक परम्परा में पितृ पक्ष की महत्ता

भारतीय महीनों की गणना के अनुसार भाद्रपद माह पूर्णिमा से अपने पितृ की मोक्ष प्राप्ति के लिए अपने पूर्वजों के प्रति श्राद्ध का महापर्व शुरु हो जाता है इसको महापर्व इस लिए कहा जाता है क्योंकि नवदुर्गा पर्व नव दिन का और  दशहरा पर्व दस दिन का होता है पर यह पितृ पक्ष सोलह दिनों तक चलता है| 

हिन्दू धर्म के अनुसार अश्विन माह के कृष्ण पक्ष से अमावस्या तक अपने पितरों के श्राद्ध की परम्परा है यानि की बारह महीनो के मध्य में छठे माह भाद्रपद माह की पूर्णिमा से सातवें माह के अश्विन के प्रथम पांच दिनों में यह पितृ पक्ष का महापर्व मनाया जाता है| हमारे हिन्दू धर्म में माता पिता की सेवा को सबसे बड़ी पूजा माना गया है| इसलिए हिन्दू धर्म शास्त्रों में पितरों का उद्धार करने के लिए पुत्र की अनिवार्यता मानी गयी है| जन्मदाता माता-पिता के मृत्यु के उपरांत लोग विस्मृत न कर दें इसलिए उनका श्राद्ध करने का विशेष विधान बताया गया है|

 पुराणों में कई कथाएं इस उपलक्ष्य को लेकर है जिसमे कर्ण के पूर्वजन्म की कथा काफी प्रचलित है एवं हिन्दू धर्म में भी सर्वमान्य श्री रामचरित में भी श्री राम के द्वारा श्री दशरथ और जटायु को गोदावरी नदी पर जलांजलि देने का उल्लेख है|  

भारतीय धर्म के अनुसार मनुष्य पर तीन प्रकार के ऋण प्रमुख माने गए हैं 

1- पितृ ऋण 

2- देव ऋण 

3- ऋषि ऋण 

इन तीनो ऋणों मे पितृ ऋण सर्वोपरि माना गया है पितृ ऋण में पिता के अतरिक्त माता तथा सब बुजुर्ग भी सम्मलित हैं| जिन्होंने हमें अपना जीवन धारण करने में अपना योगदान यानि सहयोग दिया| 

 

 एकैकस्य तिलैर्मिश्रांस्त्रींस्त्रीन् दद्याज्जलाज्जलीन्। यावज्जीवकृतं पापं तत्क्षणादेव नश्यति।

अर्थात् जो अपने पितरों को तिल-मिश्रित जल की तीन-तीन अंजलियाँ प्रदान करते हैं, उनके जन्म से तर्पण के दिन तक के पापों का नाश हो जाता है। हमारे हिंदू धर्म-दर्शन के अनुसार जिस प्रकार जिसका जन्म हुआ है, उसकी मृत्यु भी निश्चित है उसी प्रकार जिसकी मृत्यु हुई है, उसका जन्म भी निश्चित है। ऐसे कुछ विरले ही होते हैं जिन्हें मोक्ष प्राप्ति हो जाती है। पितृपक्ष में तीन पीढ़ियों तक के पिता पक्ष के तथा तीन पीढ़ियों तक के माता पक्ष के पूर्वजों के लिए तर्पण किया जाता हैं। इन्हीं को पितर कहते हैं। दिव्य पितृ तर्पण, देव तर्पण, ऋषि तर्पण और दिव्य मनुष्य तर्पण के पश्चात् ही स्व-पितृ तर्पण किया जाता है। भाद्रपद पूर्णिमा से आश्विन कृष्णपक्ष अमावस्या तक के सोलह दिनों को पितृपक्ष कहते हैं। जिस तिथि को माता-पिता का देहांत होता है, उसी तिथी को पितृपक्ष में उनका श्राद्ध किया जाता है। शास्त्रों के अनुसार पितृपक्ष में अपने पितरों के निमित्त जो अपनी शक्ति सामर्थ्य के अनुरूप शास्त्र विधि से श्रद्धापूर्वक श्राद्ध करता है, उसके सकल मनोरथ सिद्ध होते हैं और घर-परिवार, व्यवसाय तथा आजीविका में हमेशा उन्नति होती है। पितृ दोष के अनेक कारण होते हैं। परिवार में किसी की अकाल मृत्यु होने से, अपने माता-पिता आदि सम्मानीय जनों का अपमान करने से, मरने के बाद माता-पिता का उचित ढंग से क्रियाकर्म और श्राद्ध नहीं करने से, उनके निमित्त वार्षिक श्राद्ध आदि न करने से पितरों का दोष लगता है। इसके फलस्वरूप परिवार में अशांति, वंश-वृद्धि में रूकावट, आकस्मिक बीमारी, संकट, धन में बरकत न होना, सारी सुख सुविधाएँ होते हुए भी मन असन्तुष्ट रहना आदि पितृ दोष हो सकते हैं। 

यदि परिवार के किसी सदस्य की अकाल मृत्यु हुई हो तो पितृ दोष के निवारण के लिए  श्राद्ध कर सकते हैं। अपने माता-पिता तथा अन्य ज्येष्ठ जनों का अपमान न करें। प्रतिवर्ष पितृपक्ष में अपने पूर्वजों का श्राद्ध, तर्पण अवश्य करें। यदि इन सभी क्रियाओं को करने के पश्चात् पितृ दोष से मुक्ति न होती हो तो ऐसी स्थिति में आप हमारे संस्था (G.D.Vashist Jyotish Sansthan)  द्वारा पितृ दोष की जानकारी प्राप्त कर सकते हैं  यदि आपकी जन्मकुंडली में पितृ दोष हो तो आप पितृ ऋण  का समाधान अपनी  (Yes I Can Change) जन्मकुण्डली  के माध्यम  से प्राप्त कर सकते हैं|

 

किसी समस्या या जानकारी के लिए आप निचे दिए गए लिंक पे क्लिक कर जानकारी ले सकते हैं :-   

https://goo.gl/1YW4G8

 

Date Published : 06 Sep 2017
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