बस अब दु:ख और नहीं
Call Us: +91-124-6674671

धार्मिक परम्पराओं के अनुसार दिवाली पर्व का महत्व

दीपावली हमारा सबसे प्राचीन धार्मिक पर्व है। यह पर्व प्रतिवर्ष कार्तिक मास की अमावस्या को मनाया जाता है। देश-विदेश में यह बड़ी श्रद्धा, विश्वास एवं समर्पित भावना के साथ मनाया जाता है।यह पर्व ‘प्रकाश-पर्व’ के रूप में मनाया जाता है। इस पर्व के साथ अनेक धार्मिक, पौराणिक एवं ऐतिहासिक मान्यताएं जुड़ी हुई हैं। मुख्यतया: यह पर्व लंकापति रावण पर विजय हासिल करके और अपना चौदह वर्ष का वनवास पूरा करके अपने घर आयोध्या लौटने की खुशी में मनाया जाता है। पौराणिक कथाओं के अनुसार जब श्रीराम अपनी पत्नी सीता व छोटे भाई लक्ष्मण सहित आयोध्या में वापिस लौटे थे तो नगरवासियों ने घर-घर दीप जलाकर खुशियां मनाईं थीं। इसी पौराणिक मान्यतानुसार प्रतिवर्ष घर-घर घी के दीये जलाए जाते हैं और खुशियां मनाई जाती हैं|

दीपावली पर्व से कई अन्य मान्यताएं, धारणाएं एवं ऐतिहासिक घटनाएं भी जुड़ी हुई हैं। कठोपनिषद् में यम-नचिकेता का प्रसंग आता है। इस प्रसंगानुसार नचिकेता जन्म-मरण का रहस्य यमराज से जानने के बाद यमलोक से वापिस मृत्युलोक में लौटे थे। एक धारणा के अनुसार नचिकेता के मृत्यु पर अमरता के विजय का ज्ञान लेकर लौटने की खुशी में भू-लोकवासियों ने घी के दीप जलाए थे। किवदन्ती है कि यही आर्यवर्त की पहली दीपावली थी।

एक अन्य पौराणिक घटना के अनुसार इसी दिन श्री लक्ष्मी जी का समुन्द्र-मन्थन से आविर्भाव हुआ था। इस पौराणिक प्रसंगानुसार ऋषि दुर्वासा द्वारा देवराज इन्द्र को दिए गए शाप के कारण श्री लक्ष्मी जी को समुद्र में जाकर समाना पड़ा था। लक्ष्मी जी के बिना देवगण बलहीन व श्रीहीन हो गए। इस परिस्थिति का फायदा उठाकर असुर सुरों पर हावी हो गए। देवगणों की याचना पर भगवान विष्णु ने योजनाबद्ध ढ़ंग से सुरों व असुरों के हाथों समुद्र-मन्थन करवाया। समुन्द्र-मन्थन से अमृत सहित चौदह रत्नों में श्री लक्ष्मी जी भी निकलीं, जिसे श्री विष्णु ने ग्रहण किया। श्री लक्ष्मी जी के पुनार्विभाव से देवगणों में बल व श्री का संचार हुआ और उन्होंने पुन: असुरों पर विजय प्राप्त की। लक्ष्मी जी के इसी पुनार्विभाव की खुशी में समस्त लोकों में दीप प्रज्जवलित करके खुशियां मनाईं गई। इसी मान्यतानुसार प्रतिवर्ष दीपावली को श्री लक्ष्मी जी की पूजा-अर्चना की जाती है। मार्कंडेय पुराण के अनुसार समृद्धि की देवी श्री लक्ष्मी जी की पूजा सर्वप्रथम नारायण ने स्वर्ग में की। इसके बाद श्री लक्ष्मी जी की पूजा दूसरी बार, ब्रह्मा जी ने, तीसरी बार शिव जी ने, चौथी बार समुन्द्र मन्थन के समय विष्णु जी ने, पांचवी बार मनु ने और छठी बार नागों ने की थी।

दीपावली पर्व के सन्दर्भ मे एक पौराणिक प्रसंग भगवान श्रीकृष्ण भी प्रचलित है। इस प्रसंग के अनुसार भगवान श्रीकृष्ण बाल्यावस्था मे पहली बार गाय चराने के लिए वन में गए थे। संयोगवश इसी दिन श्रीकृष्ण ने इस मृत्युलोक से प्रस्थान किया था। एक अन्य प्रसंगानुसार इसी दिन श्रीकृष्ण ने नरकासुर नामक नीच असुर का वध करके उसके द्वारा बंदी बनाई गई देव, मानव और गन्धर्वों की सोलह हजार कन्याओं को मुक्ति दिलाई थी। इसी खुशी में लोगों ने दीप जलाए थे, जोकि बाद मे एक परंपरा में परिवर्तित हो गई।

दीपावली के पावन पर्व से भगवान विष्णु के वामन अवतार की लीला भी जुड़ी हुई है। एक समय दैत्यराज बलि ने परम तपस्वी गुरू शुक्राचार्य के सहयोग से देवलोक के राजा इन्द्र को परास्त करके स्वर्ग पर अधिकार कर लिया। समय आने पर भगवान विष्णु ने अदिति के गर्भ से महर्षि कश्यप के घर वामन के रूप में अवतार लिया। जब राजा बलि भृगकच्छ नामक स्थान पर अश्वमेघ यज्ञ कर रहे थे तो भगवान वामन ब्राहा्रण वेश मे राजा बलि के यज्ञ मण्डल में जा पहुंचे। बलि ने वामन से इच्छित दान मांगने का आग्रह किया। वामन ने बलि से संकल्प लेने के बाद तीन पग भूमि मांगी। संकल्पबद्ध राजा बलि ने  ब्राह्मण वेशधारी भगवान वामन को तीन पग भूमि नापने के लिए अनुमति दे दी। तब भगवान वामन ने पहले पग में समस्त भूमण्डल और दूसरे पग में त्रिलोक को नाप डाला। तीसरे पग में बलि ने विवश होकर अपने सिर को आगे बढ़ाना पड़ा। बलि की इस दान वीरता से भगवान वामन प्रसन्न हुए। उन्होंने बलि को सुतल लोक का राजा बना दिया और इन्द्र को पुन: स्वर्ग का स्वामी बना दिया। देवगणों ने इस अवसर पर दीप प्रज्जवलित करके खुशियां मनाई और पृथ्वीलोक में भी भगवान वामन की इस लीला के लिए दीप मालाएं प्रज्जवलित कीं।

दीपावली के दीपों के सन्दर्भ में देवी पुराण का एक महत्वपूर्ण प्रसंग भी जुड़ा हुआ है। इसी दिन दुर्गा मातेश्वरी ने महाकाली का रूप धारण किया था और असंख्य असुरों सहित चण्ड और मुण्ड को मौत के घाट उतारा था। मृत्युलोक से असुरों का विनाश करते-करते महाकाली अपना विवके खो बैठीं और क्रोध में उसने देवों का भी सफाया करना शुरू कर दिया। देवताओं की याचना पर शिव महाकाली के समक्ष प्रस्तुत हुए। क्रोधावश महाकाली शिव के सीने पर भी चढ़ बैठीं। लेकिन, शिव-’शरीर का स्पर्श पाते ही उसका क्रोध शांत हो गया। किवदन्ती है कि तब दीपोत्सव मनाकर देवों ने अपनी खुशी का प्रकटीकरण किया।अनेक पौराणिक कथाओं के अनुसार दीपवाली पर्व का हर्ष ओर उल्लास धार्मिक परम्पराओं मे सर्वोपरि है 

 

Date Published : 17 Oct 2017
View all blogs

like & follow

Contact Info
Follow Us
           
     

We accept all these major cards

Yes I Can Change
Copyright © 2005 - 2017. G D Vashist & Associates Pvt. Ltd. All Rights Reserved.
हिंदी में पढ़े Yes I Can Change Tell My Luck